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लाभ पद्धति

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आयुर्वेद पद्धति से इलाज कराने पर भी मिलेगा इंश्योरेंस का लाभ

फाइल फोटो

आयुर्वेद व परंपरागत पद्धति से इलाज कराने पर भी हेल्थ इंश्योरेंस का लाभ मिलेगा। इस संबंध में आयुष मंत्रालय की ओर से दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं। बीमा के तहत 20 गंभीर बीमारियों के इलाज में कैशलेस इंश्योरेंस का लाभ मिल सकेगा। किस बीमारी में मरीज को इंश्योरेंस का कितना पैसा मिलेगा इस संबंध में भी दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

सर्वाइकल स्पोंडिलाइसिस, पीठ का दर्द, लकवा, रियमोटाइड ऑथराइटिस, जोड़ों के दर्द, चर्म रोग, सिर में तेज दर्द (माइग्रेन), दृष्टि दोष सहित कई अन्य बीमारियों के इलाज कराने में बीमा मददगार होगा। अलग-अलग बीमारियों पर इंश्योरेंस कवर के अलग-अलग शुल्क तय किए गए हैं। आयुष मंत्रालय का यह निर्णय मरीजों के लिए काफी लाभदायक होगा।

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भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति : प्राकृतिक खेती के लिए 8 राज्यों को मिले 45 करोड़ रुपए

भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति : प्राकृतिक खेती के लिए 8 राज्यों को मिले 45 करोड़ रुपए

जानें, क्या है बीपीकेपी योजना और इसके लाभ?

प्राकृतिक खेती प्रणाली को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने एक महती योजना प्रस्तुत की है। जिसका नाम भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) है। यह योजना प्राकृतिक खेती सहित पारंपरिक स्वदेशी प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए 2020-21 से परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) की उप योजना के रूप में पेश की गई है। इसके तहत इस वित्तीय वर्ष केंद्र सरकार ने 8 राज्यों के लिए 45 करोड़ रुपए दिए हैं।

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क्या है भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) योजना?

परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति कार्यक्रम (बीपीकेपी) के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। बीपीकेपी योजना का उद्देश्य पारंपरिक स्वदेशी प्रथाएं जो बाहरी रूप से खरीदे गए आदानों को कम करती हैं को बढ़ावा देना है। यह काफी लाभ पद्धति हद तक ऑन-फार्म बायोमास रीसाइक्लिंग पर आधारित है, जो बायोमास मल्चिंग, ऑन-फार्म गाय गोबर-मूत्र का उपयोग; आवधिक मिट्टी का मिश्रण और सभी सिंथेटिक रासायनिक आदानों का बहिकार पर मुख्य जोर देता है। बीपीकेपी योजना मुख्य रूप से सभी सिंथेटिक रासायनिक आदानों के बहिष्कार पर जोर देती है और कृषि बायोमास रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देती है। गोबर-मूत्र के मिश्रण का उपयोग, भूमि की तैयारी के समय उपयोग आदि बातों को महत्व देती है। इस योजना का मुख्य उद्देश्य रासायनिक उर्वरकों का कम से कम इस्तेमाल पर जोर देना है ताकि शून्य बजट पर खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा सके।


बीपीकेपी के तहत सरकार से कितनी मिलती है वित्तीय सहायता?

बीपीकेपी के तहत, क्लस्टर लाभ पद्धति निर्माण, क्षमता निर्माण और प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा प्रमाणीकरण और अवशेष विश्लेषण के लिए 12200 /- रुपए प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता प्रथम 3 वर्ष तक दी है। अब तक, प्राकृतिक खेती के तहत 4.09 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया है और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित देश भर के 8 राज्यों में 4587.17 लाख रुपए जारी किए गए हैं।


क्या है प्राकृतिक खेती प्रणाली और कब शुरू हुई?

प्राकृतिक खेती एक केमिकल-मुक्त अथवा पारंपरिक खेती विधि है। इसे कृषि-पारिस्थितिकी आधारित कृषि प्रणाली माना जाता है जो फसलों, पेडों और पशुधन को कियात्मक जैव विविधता के साथ एकीकृत करती है। प्राकृतिक खेती की शुरुआत एक जापानी किसान, मासानोबू फुकुओका द्वारा की गई थी, जो एक प्राकृतिक चक्र और प्राकृतिक दुनिया की प्रक्रियाओं के साथ काम करने के दर्शन पर आधारित है।


प्राकृतिक खेती से छोटी जोत के किसानों को मिलेगी मदद

एचएलपीई की रिपोर्ट अनुसार, प्राकृतिक खेती से खरीदे गए आदानों पर निर्भरता कम होगी और छोटी (जोत के) किसानों के ऋण के बोझ को कम करने में मदद मिलेगी। बीपीकेपी योजना पीजीएस इंडिया कार्यक्रम के तहत पीजीएस-इंडिया सर्टिफिकेशन के अनुरूप है। इस वित्तीय केंद्र सरकार ने बीपीकेपी योजना के लिए 8 राज्यों को करीब 45 करोड़ की राशि प्रदान की है।


बीपीकेपी योजना की अब तक की प्रगति

भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति कार्यक्रम को मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और केरल राज्य में अपनाया गया है। कई अध्ययनों में भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति कार्यक्रम की प्रभावशीलता अर्थात् उत्पादन में वृद्धि, स्थिरता, जल उपयोग की बचत, मृदा स्वास्थ्य में सुधार और कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के मामले में प्राकृतिक कृषि की सूचना दी गई है। इसे रोजगार संवर्धन और ग्रामीण के अवसर के साथ लागत प्रभावी कृषि पद्धतियों के रूप में माना जाता है। नीति आयोग ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के साथ मिलकर प्राकृतिक कृषि पद्धतियों पर वैश्विक विशेषज्ञों के साथ कई उच्च स्तरीय विचार-विमर्श किए जिसमें मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में करीब 2.5 मिलियन किसान पहले से ही पुनरुत्पादक कृषि अपना रहे हैं। अगले 5 सालों मे, इसे प्राकृतिक खेती सहित जैविक खेती के किसी भी रूप में, 20 लाख हेक्टेयर तक पहुंचने का अनुमान है - जिसमें से बीपीकेपी के अधीन 12 लाख हेक्टेयर है। भारत ने जैविक खेती को बढ़ावा देकर महत्वपूर्ण छाप छोड़ी है। बता दें कि विश्व की जैविक खेती के संदर्भ में भारत का 9 वां स्थान है। भारत में जैविक खेती का रकबा 1.94 लमलियन हेक्टेयर क्षेत्र है। वहीं उत्पादकों की संख्या के संदर्भ में पहला (उत्पादक का 11.49 किसान) था, 2020 के आंकडों के अनुसार कुल निर्यात मूल्य 757.49 मिलियन अमेरिकी डालर है।


केंद्र सरकार द्वारा बीपीकेपी योजना के लिए राज्य वार जारी राशि

लाभ पद्धति लाभ पद्धति
क्रमांक राज्य क्षेत्रफल (हेक्टेयर) राशि (लाख में)
1. आंध्र प्रदेश 100000 750.00
2. छत्तीसगढ़ 85000 1352.52
3. केरल 84000 1336.60
4. हिमाचल प्रदेश 12000 286.42
5. झारखंड 3400 54.10
6. उड़ीसा 24000381.89
7. मध्य प्रदेश 9900 393.82
8. तमिलनाडु 2000 31.82
कुल 409400 4587.17

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पाइप वितरण के लेआउट की ग्रिड-आयरन पद्धति का निम्नलिखित में से कौन सा लाभ नहीं है?

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लाभ पद्धति

भारत सरकार ने गरीबों पर ध्यान केन्द्रित करते हुए जून , 1997 में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली शुरू की थी। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन राज्यों के लाभ पद्धति लिए यह अपेक्षित है कि वे गरीबों की पहचान करने , उचित दर दुकानों पर खाद्यान्नों की सुपुर्दगी देने और उचित दर दुकान स्तर पर इनका पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से वितरण करने की पुख्ता व्यवस्था बनाएं और क्रियान्वित करें।

जिस समय यह स्कीम लागू की गई थी उस समय इसका उद्देश्य लगभग 6 करोड़ गरीब परिवारों को लाभान्वित करना था , जिनके लिए वार्षिक रूप से खाद्यान्नों की लगभग 72 लाख टन मात्रा निर्दिष्ट की गई थी। इस योजना के अंतर्गत गरीबों की पहचान स्‍वर्गीय प्रो . लाकड़ावाला की अध्यक्षता में " गरीबों का अनुपात और संख्या के अनुमान संबंधी विशेषज्ञ समूह " की विधि पर आधारित वर्ष 1993-94 के लिए योजना आयोग के राज्यवार निर्धनता अनुमानों के अनुसार राज्यों द्वारा की गई थी। राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को खाद्यान्नों का आवंटन विगत की औसत खपत अर्थात् लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली आरंभ करते समय पिछले दस वर्षों के दौरान सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन खाद्यान्नों के औसत वार्षिक उठान के आधार पर किया गया था।

गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों की आवश्यकता से अधिक खाद्यान्नों की मात्रा राज्य को " अस्थायी आवंटन " के रूप में प्रदान की गई थी जिसके लिए वार्षिक तौर पर खाद्यान्नों की 103 लाख टन मात्रा निर्धारित की गई थी। लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के आवंटन के अतिरिक्त राज्यों को अतिरिक्त आवंटन भी दिया गया था। अस्थायी आवंटन गरीबी रेखा से ऊपर की आबादी को राजसहायता प्राप्त खाद्यान्नों के लाभ को जारी रखने के लिए था क्योंकि उनको लाभ पद्धति सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत मिलने वाले मौजूदा लाभ को अचानक समाप्त करना वांछनीय नहीं समझा गया था। अस्थायी आवंटन ऐसे मूल्यों पर जारी किया गया था जो राजसहायता प्राप्त थे परन्तु खाद्यान्नों के गरीबी रेखा से नीचे के कोटे के मूल्यों से अधिक थे।

गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को खाद्यान्नों के आवंटन में वृद्धि करने पर एक राय होने की दृष्टि में और खाद्य सब्सिडी को बेहतर लक्षित करने के लिए , भारत सरकार ने 1.4.2000 से गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों को खाद्यान्नों का आवंटन आर्थिक लागत के 50% पर 10 किलोग्राम से बढ़ाकर 20 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह कर दिया और गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों को आर्थिक लागत पर आवंटन किया गया। गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों के लिए आवंटन को लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के शुरू होने लाभ पद्धति के समय में किए गए आवंटन के स्तर पर बनाए रखा गया था लेकिन उनके लिए केन्द्रीय निर्गम मूल्य को उक्त तारीख से आर्थिक लागत के 100% पर निर्धारित कर दिया गया ताकि समस्त उपभोक्ता राजसहायता गरीबी रेखा से नीचे की आबादी के लाभ के लिए दी जा सके। तथापि , बीपीएल और अंत्‍योदय अन्‍न योजना के लिए क्रमश: जुलाई और दिसंबर 2000 में निर्धारित और एपीएल के लिए जुलाई 2002 में निर्धारित केन्‍द्रीय निगम मूल्‍यों को खरीद की लागत में वृद्धि के बावजूद बढ़ाया नहीं गया है।

गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की संख्‍या में दिनांक 01.12.2000 से वृद्धि की गई जिसमें वर्ष 1995 के पूर्ववर्ती जनसंख्‍या अनुमानों के स्‍थान पर दिनांक 01.लाभ पद्धति 03.2000 की स्थिति की स्थिति के अनुसार महा-पंजीयक के आबादी संबंधी अनुमानों को आधार बनाया गया। इस वृद्धि से बीपीएल परिवारों की कुल स्‍वीकृत संख्‍या 652.03 लाख , जब जून , 1997 में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली लागू की गई थी , परिवारों की मूल रुप से अनुमानित संख्‍या 596.23 लाख थी।

मौजूदा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत अंतिम खुदरा मूल्य थोक/खुदरा विक्रेताओं के मार्जिन , ढुलाई प्रभार , लेवी , स्थानीय कर आदि को हिसाब में लेने के बाद राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा निर्धारित किया जाता है। राज्यों से पहले ही अनुरोध किया गया था कि वे इस प्रणाली में गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों के लिए केन्द्रीय निर्गम मूल्यों के ऊपर से 50 पैसे से अधिक अंतर पर खाद्यान्न जारी न करें। तथापि वर्ष 2001 से अंत्योदय अन्न योजना , जिसमें अंतिम खुदरा मूल्य को गेहूं के लिए 2 रूपये प्रति किलोग्राम और चावल के लिए 3 रूपये प्रति किलोग्राम रखा जाना है , को छोड़कर लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अधीन खाद्यान्नों का वितरण करने के लिए केन्द्रीय निर्गम मूल्यों के ऊपर 50 पैसे तक मार्जिन के प्रतिबंध को हटाकर खुदरा निर्गम मूल्य निर्धारित करने के लिए राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को लचीला रुख अपनाने का अधिकार दिया गया है।

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